चींटी की वजह से माँ के साथ अनोखा रिश्ता

मैं रोहन हूँ, और उस दिन की शुरुआत बिल्कुल सामान्य थी। सुबह के नौ बजे थे, जब मैं अपने छोटे से घर की बालकनी में खड़ा होकर चाय पी रहा था। हमारा घर दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में है, जहाँ हर सुबह पड़ोसियों की आवाजें और सड़क पर चलती गाड़ियों का शोर एक रूटीन बन चुका है। मैं कॉलेज से छुट्टी पर था, और माँ घर के कामों में लगी हुई थीं। पापा ऑफिस चले गए थे, और मैं सोच रहा था कि आज दिन कैसे बिताऊँ।

माँ का नाम शीला है, वे पैंतालीस साल की हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा देखकर लगता नहीं। वे घर संभालती हैं, और कभी-कभी पड़ोस की महिलाओं के साथ सिलाई का काम भी करती हैं। मैं बाईस साल का हूँ, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हूँ, और घर पर रहते हुए माँ की मदद करता हूँ। हमारा परिवार छोटा है – सिर्फ हम तीन। पापा एक सरकारी नौकरी में हैं, जो उन्हें ज्यादातर बाहर रखती है। उस सुबह माँ रसोई में नाश्ता बना रही थीं, और मैंने उन्हें आवाज दी, "माँ, चाय कैसी बनी है?" वे मुस्कुराकर बोलीं, "बेटा, हमेशा की तरह। आओ, नाश्ता कर लो।"

नाश्ते के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, किताब पढ़ने लगा। बाहर मौसम गर्म था, जून का महीना जो ठहरा। घर में कूलर चल रहा था, लेकिन फिर भी हल्की उमस महसूस हो रही थी। माँ ने कहा कि वे बगीचे में कुछ काम करेंगी, हमारे घर के पीछे एक छोटा सा बगीचा है, जहाँ वे सब्जियाँ उगाती हैं। मैंने सोचा कि मैं भी बाद में जाकर मदद करूँगा। जीवन ऐसे ही चल रहा था, बिना किसी खास घटना के।

कुछ देर बाद माँ की आवाज आई, "रोहन, जरा इधर आना!" उनकी आवाज में थोड़ी हड़बड़ी थी, लेकिन मैंने सोचा शायद कोई सामान्य काम होगा। मैं बाहर बगीचे की तरफ गया। माँ वहाँ झुकी हुई बैठी थीं, उनके चेहरे पर असहज भाव थे। "क्या हुआ माँ?" मैंने पूछा। वे बोलीं, "बेटा, यहाँ घास में कुछ कीड़े हैं, लगता है कोई चींटी काट गई।" मैंने देखा कि वे अपनी साड़ी को ठीक कर रही थीं, लेकिन ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

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माँ ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "रोहन, मुझे लगता है कोई चींटी अंदर घुस गई है। बहुत जलन हो रही है।" मैं स्तब्ध रह गया। अंदर मतलब? वे शर्माते हुए बोलीं, "नीचे की तरफ, बेटा। मैं खुद नहीं देख पा रही।" मेरे मन में एक अजीब सी घबराहट हुई। मैंने कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया था। "माँ, डॉक्टर के पास चलें?" मैंने सुझाव दिया। लेकिन वे बोलीं, "नहीं, इतनी छोटी बात के लिए? तू बस देख ले, अगर निकाल सके तो।"

हम घर के अंदर चले गए, माँ के कमरे में। वे बिस्तर पर बैठ गईं, और मैं घबराते हुए उनके पास गया। माँ ने अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर की, और पेटीकोट को ढीला किया। मैंने कभी उन्हें ऐसे नहीं देखा था, लेकिन उस पल में सिर्फ मदद का ख्याल था। "देखो बेटा, यहाँ जलन है," उन्होंने इशारा किया। मैंने सावधानी से देखा, और सच में एक छोटी सी चींटी वहाँ फँसी हुई लग रही थी। मेरे हाथ काँप रहे थे, लेकिन मैंने उसे निकालने की कोशिश की।

जैसे ही मैंने छुआ, माँ ने एक हल्की सी सिसकारी ली। "आराम से, रोहन।" उनकी आवाज में दर्द था, लेकिन कुछ और भी। मैंने चींटी को निकाला, लेकिन जलन कम नहीं हुई। "माँ, क्रीम लगा दूँ?" मैंने पूछा। वे सहमति में सिर हिलाईं। मैंने दवा की शीशी ली और धीरे से लगाई। उस स्पर्श में कुछ ऐसा था जो मुझे अजीब लगा, लेकिन मैंने खुद को संभाला। माँ की आँखें बंद थीं, और वे गहरी साँस ले रही थीं।

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उस घटना के बाद दिन सामान्य गुजरा, लेकिन मेरे मन में कुछ बदल गया। शाम को जब पापा घर आए, तो सब कुछ वैसा ही था। रात के खाने पर हमने बातें कीं, लेकिन माँ की नजरें मुझसे बच रही थीं। मैं भी असहज महसूस कर रहा था। रात को सोते समय मैं उस पल के बारे में सोचता रहा। माँ के शरीर का वह स्पर्श, उनकी सिसकारी – यह सब मेरे दिमाग में घूम रहा था। क्या यह गलत था? लेकिन वह तो सिर्फ मदद थी।

अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन। लेकिन माँ ने मुझसे कहा, "रोहन, कल की जलन अभी भी है। क्या तू फिर से देखेगा?" मैं चौंक गया। "माँ, डॉक्टर को दिखा लें।" लेकिन वे बोलीं, "नहीं बेटा, तू ही कर दे।" इस बार कमरे में जाकर, उन्होंने खुद ही अपनी साड़ी व्यवस्थित की। मैंने देखा कि कोई घाव नहीं था, लेकिन वे कह रही थीं कि असहज लग रहा है। जैसे ही मैंने छुआ, माँ ने मेरे हाथ को पकड़ लिया। "धीरे से, रोहन।"

उनकी आँखों में एक अलग चमक थी। मेरे मन में संघर्ष चल रहा था – यह मेरी माँ हैं, लेकिन यह स्पर्श कुछ और जगा रहा था। मैंने मालिश की तरह हाथ फेरा, और माँ की साँसें तेज हो गईं। "बेटा, ऐसे ही," उन्होंने फुसफुसाया। मैं रुक नहीं पाया। धीरे-धीरे मेरा हाथ आगे बढ़ा, और माँ ने कोई विरोध नहीं किया। उस पल में भावनाएँ उफान पर थीं – प्यार, डर, और एक अनजानी चाहत।

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उस दिन के बाद हमारे बीच एक चुप्पी छा गई, लेकिन नजरें मिलतीं तो कुछ कह जातीं। शाम को जब पापा सो गए, माँ मेरे कमरे में आईं। "रोहन, क्या हम बात करें?" उन्होंने पूछा। मैंने सिर हिलाया। वे बोलीं, "कल जो हुआ, वह गलत नहीं था। मैं अकेली हूँ, और तू मेरा बेटा है। लेकिन वह स्पर्श... मुझे अच्छा लगा।" मेरे मन में तूफान था। "माँ, लेकिन यह..." मैंने कहा, लेकिन वे चुप करा दीं।

रात गहराती गई, और हम बातें करते रहे। माँ ने अपने जीवन की कहानी सुनाई – कैसे पापा हमेशा व्यस्त रहते हैं, कैसे वे अकेलापन महसूस करती हैं। मैंने भी अपने मन की बातें कही। धीरे-धीरे हम करीब आए, और एक चुंबन हुआ। वह पहला स्पर्श इतना भावुक था कि मैं भूल गया सब कुछ। माँ की बाहें मेरे चारों ओर थीं, और मैंने महसूस किया उनकी गर्माहट।

उस रात हमने सीमाएँ लाँघीं। माँ ने मुझे अपने शरीर से परिचित कराया, धीरे-धीरे, प्यार से। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वे सिहर उठीं। "रोहन, ऐसे ही," उन्होंने कहा। हमारा मिलन इतना सेंसरी था – उनकी त्वचा की कोमलता, साँसों की गर्मी, और वह भावनात्मक जुड़ाव। यह सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि वर्षों के अकेलेपन का अंत।

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अगले दिनों में यह रिश्ता गहराता गया। हर बार अलग अनुभव – कभी धीमा और भावुक, कभी तीव्र। एक दिन हम बगीचे में थे, जहाँ सब शुरू हुआ। माँ ने कहा, "यहीं से तो चींटी ने हमें करीब लाया।" मैं हँस पड़ा, और हमने वहाँ ही एकांत पाया। उनकी आहें, मेरी चाहत – सब मिश्रित हो गया।

लेकिन मन में संघर्ष था। क्या यह सही है? माँ कहतीं, "बेटा, जीवन छोटा है। हमें खुशी मिल रही है।" मैं सहमत होता, लेकिन डरता भी। फिर भी, हर मिलन में नई भावना जुड़ती – कभी कोमलता, कभी जुनून।

एक शाम पापा घर पर थे, लेकिन हमारी नजरें मिलीं। रात को जब वे सो गए, माँ मेरे पास आईं। हमने चुपचाप प्यार किया, सावधानी से। वह अनुभव और भी रोमांचक था – खतरे की छाया में। माँ की बॉडी मेरे नीचे थी, और मैंने महसूस किया उनकी हर धड़कन।

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समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता मजबूत होता गया। चींटी की वह छोटी घटना ने हमें एक नई दुनिया दिखाई। अब हर पल में वह भावनात्मक गहराई है, जो हमें बाँधे रखती है।

आज फिर शाम हो रही है, और माँ रसोई में हैं। मैं उनके पास जाता हूँ, और हमारी नजरें मिलती हैं। वह मुस्कान कहती है कि रात फिर वैसी ही होगी। मैं उनके करीब जाता हूँ, और हमारा स्पर्श शुरू होता है