चाची की गुप्त सीख
सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की छनकर आ रही थी। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, घड़ी की टिक-टिक सुनते हुए, और सोच रहा था कि आज कॉलेज जाना है या नहीं। घर में सब अपनी-अपनी दिनचर्या में लगे थे; पापा ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे, मम्मी रसोई में नाश्ता बना रही थीं।
मैं उठकर बाथरूम गया, चेहरा धोया और नीचे उतर आया। डाइनिंग टेबल पर चाची पहले से ही बैठी थीं, चाय की प्याली थामे हुए। चाची का नाम प्रिया है, पापा की छोटी बहन, जो पिछले दो साल से हमारे साथ रह रही हैं। चाचा की मौत के बाद उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था, और अब यहीं बस गई थीं।
मैंने उन्हें गुड मॉर्निंग कहा और अपनी कुर्सी पर बैठ गया। चाची ने मुस्कुराकर चाय का कप मेरी तरफ बढ़ाया। "राहुल, आज कॉलेज जाओगे न? कल तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम्हारी अटेंडेंस कम हो गई है।" उनकी आवाज में हमेशा की तरह एक ममता भरी चिंता थी।
मैंने चाय का घूंट लिया और हंसकर कहा, "हां चाची, जाऊंगा। बस थोड़ी आलस आ रही है।" घर में चाची की मौजूदगी से सब कुछ व्यवस्थित लगता था। वो सुबह उठकर घर के काम संभालतीं, मम्मी की मदद करतीं, और शाम को मेरे साथ पढ़ाई के बारे में बातें करतीं।
पापा ने अखबार फोल्ड किया और कहा, "प्रिया, आज शाम को बाजार से कुछ सामान लाना है। राहुल, तुम साथ चले जाना।" मैंने हामी भरी। चाची ने मेरी तरफ देखा और बोलीं, "ठीक है भाई साहब, मैं लिस्ट बना दूंगी।" नाश्ता खत्म होने के बाद पापा ऑफिस चले गए, मम्मी अपने काम में लग गईं।
मैं कॉलेज के लिए तैयार होने लगा। चाची ऊपर के कमरे में कपड़े इस्त्री कर रही थीं। मैं अपना बैग पैक करके नीचे आया तो वो रसोई में थीं। "राहुल, लंच बॉक्स ले जाना मत भूलना," उन्होंने कहा। उनकी ये छोटी-छोटी फिक्र मुझे हमेशा अच्छी लगती थी।
कॉलेज से लौटकर मैं थका हुआ घर पहुंचा। शाम हो चुकी थी, और घर में हल्की रोशनी जल रही थी। चाची ड्राइंग रूम में बैठी टीवी देख रही थीं। "आ गए बेटा? चलो, चाय बनाती हूं," उन्होंने कहा और उठकर रसोई की तरफ गईं।
मैं सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद चाची चाय लेकर आईं और मेरे बगल में बैठ गईं। "आज कॉलेज कैसा रहा?" उन्होंने पूछा। मैंने बताया कि लेक्चर बोरिंग थे, लेकिन दोस्तों के साथ मजा आया। वो हंसती रहीं, उनकी हंसी में एक अलग सी मिठास थी।
शाम को पापा ने कहा कि बाजार जाना है। मैं और चाची साथ निकले। बाजार में घूमते हुए हमने सब्जियां और किराने का सामान खरीदा। रास्ते में चाची ने मेरे बचपन की बातें छेड़ दीं। "तुम छोटे थे तब कितने शैतान थे, राहुल। याद है, कैसे मेरी साड़ी खींचते थे?"
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मैं हंस पड़ा। "हां चाची, लेकिन अब तो बड़ा हो गया हूं।" घर लौटकर हमने सामान रखा। रात का खाना खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। मैं अपने कमरे में लेटा किताब पढ़ रहा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
रात करीब ग्यारह बजे, मैं पानी पीने नीचे गया। रसोई में हल्की रोशनी थी। चाची वहां खड़ी कुछ ढूंढ रही थीं। "क्या हुआ चाची?" मैंने पूछा। वो चौंक गईं और बोलीं, "अरे राहुल, नींद नहीं आ रही थी। दूध गरम कर रही हूं।"
मैं उनके पास खड़ा हो गया। हम दोनों चुपचाप खड़े रहे, दूध उबलने का इंतजार करते हुए। चाची की साड़ी की सिलवटें और उनके बालों की महक कमरे में फैली हुई थी। पहली बार मुझे लगा कि वो कितनी अकेली हैं।
दूध उबल गया। चाची ने दो गिलास में डाला और एक मुझे दिया। हम डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। "राहुल, तुम्हारी उम्र में लड़के क्या-क्या सोचते हैं?" उन्होंने अचानक पूछा। मैं थोड़ा झिझका, लेकिन बोला, "बस पढ़ाई, दोस्त, और भविष्य की बातें।"
वो मुस्कुराईं। "और लड़कियां? कोई गर्लफ्रेंड है?" उनकी आंखों में एक जिज्ञासा थी। मैंने ना में सिर हिलाया। बातें लंबी खिंचती गईं, और पहली बार मैंने महसूस किया कि चाची से बात करना कितना सहज है।
उस रात के बाद हमारी बातें बढ़ने लगीं। अगले दिन शाम को, जब घर में कोई नहीं था, चाची ने मुझे बुलाया। "राहुल, जरा मेरी मदद करो। अलमारी से सामान निकालना है।" मैं उनके कमरे में गया। वो सीढ़ी पर चढ़ी हुई थीं, और मैं नीचे से सहारा दे रहा था।
उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया, लेकिन मैंने नजरें फेर लीं। मदद करने के बाद हम बैठकर बातें करने लगे। चाची ने अपनी शादी की बातें बताईं, चाचा के साथ की यादें। उनकी आंखें नम हो गईं। "अकेलापन बहुत सताता है, राहुल।"
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मैंने उनका हाथ थाम लिया। "चाची, आप अकेली नहीं हैं। हम सब हैं न।" वो मेरी तरफ देखती रहीं, और उस पल में कुछ अनकहा सा था। धीरे-धीरे, हमारी ये मुलाकातें बढ़ती गईं।
एक दोपहर, मम्मी और पापा बाहर गए थे। मैं घर पर था, पढ़ाई कर रहा था। चाची मेरे कमरे में आईं, हाथ में फल का प्लेट लेकर। "खा लो, राहुल।" वो मेरे बगल में बैठ गईं। बातों-बातों में उन्होंने पूछा, "तुम कभी किसी लड़की के करीब गए हो?"
मैं शर्मा गया। "नहीं चाची, बस दोस्त हैं।" वो हंस पड़ीं। "मैं सिखा सकती हूं, अगर चाहो। जीवन में सब सीखना पड़ता है।" उनकी बात में एक छिपी हुई मासूमियत थी, लेकिन मुझे लगा कि वो मजाक कर रही हैं।
फिर भी, उस दिन से मेरे मन में एक उथल-पुथल शुरू हो गई। चाची को देखने का नजरिया बदलने लगा। उनकी मुस्कान, उनकी चाल, सब कुछ अलग लगने लगा। लेकिन मैं खुद को रोकता रहा, क्योंकि वो मेरी चाची थीं।
कुछ दिन बाद, रात को फिर वही हुआ। मैं नीचे गया, चाची रसोई में थीं। इस बार वो उदास लग रही थीं। "क्या हुआ चाची?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "बस, पुरानी यादें। चाचा की बहुत याद आती है।"
मैं उनके पास गया और कंधे पर हाथ रखा। वो मेरी तरफ मुड़ीं, और अचानक उनके होंठ मेरे करीब आ गए। मैं स्तब्ध रह गया। "राहुल, मुझे गले लगा लो," उन्होंने फुसफुसाया। मैंने उन्हें बाहों में भर लिया।
उस गले लगने में एक गर्माहट थी, जो धीरे-धीरे कुछ और में बदल गई। चाची की सांसें तेज हो गईं, और उन्होंने मेरे गाल पर吻 किया। "तुम मुझे अच्छे लगते हो, राहुल। बहुत दिनों से।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उन्हें और कसकर पकड़ लिया।
हम डाइनिंग टेबल के पास खड़े रहे। चाची ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू किए। मैंने उन्हें रोका नहीं। उनकी उंगलियां मेरी छाती पर फिरने लगीं। "चाची, ये गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी।
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वो बोलीं, "कुछ भी गलत नहीं, अगर दिल कहे।" फिर उन्होंने मुझे किस किया, गहरा और भावुक। मेरे शरीर में एक आग सी जलने लगी। हम कमरे की तरफ बढ़े, जहां बिस्तर था।
चाची ने अपनी साड़ी उतारनी शुरू की। उनका शरीर सुडौल था, सालों की मेहनत से तराशा हुआ। मैंने उन्हें देखा, और मन में एक संघर्ष था। लेकिन इच्छा जीत गई। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके ऊपर झुक गया।
हमारे होंठ फिर मिले। चाची की उंगलियां मेरे बालों में फिर रही थीं। मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोले, और उनकी छाती नंगी हो गई। मैंने उन्हें चूमा, धीरे-धीरे नीचे की तरफ। उनकी सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं।
"राहुल, मुझे महसूस कराओ," उन्होंने कहा। मैंने अपनी पैंट उतारी। चाची की आंखें फैल गईं, और उन्होंने हाथ बढ़ाकर छुआ। "ये... इतना बड़ा?" वो शरमाती हुई बोलीं। मैंने हंसकर कहा, "चाची, आप ही सिखाओ न।"
वो उठीं और मेरे करीब आईं। उनकी उंगलियां धीरे-धीरे मेरे लिंग पर फिसलने लगीं। मैंने आंखें बंद कर लीं। फिर उन्होंने मुंह नीचे किया, और होंठों से छुआ। पहली बार का स्पर्श इतना सुखद था कि मैं कराह उठा।
चाची ने धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। उनकी जीभ की हर हरकत एक नई संवेदना पैदा कर रही थी। मैंने उनके सिर पर हाथ रखा, निर्देश देते हुए। "धीरे चाची, ऐसे... हां, वैसा।" वो सीख रही थीं, मेरी हर बात पर अमल करते हुए।
उनकी आंखें मेरी तरफ उठीं, उनमें एक मिश्रित भावना थी – उत्सुकता और प्रेम। मैंने उन्हें ऊपर खींचा और फिर से किस किया। अब मैं उनके अंदर घुसा, धीरे-धीरे। चाची की चीख निकली, लेकिन वो खुशी की थी।
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हमारी गतिविधियां तेज हो गईं। हर धक्के के साथ चाची का शरीर कांपता। "राहुल, और तेज," उन्होंने कहा। मैंने उनकी बात मानी। हम दोनों पसीने से तर हो गए, लेकिन वो पल अनंत लग रहे थे।
क्लाइमैक्स के बाद हम एक-दूसरे की बाहों में लेटे रहे। चाची ने मेरे सीने पर सिर रखा। "ये हमारी गुप्त सीख है, राहुल।" मैंने हामी भरी, लेकिन मन में एक अपराधबोध था। फिर भी, वो भावना मजबूत हो रही थी।
अगले दिनों हमारी मुलाकातें छिपी-छिपी जारी रहीं। एक शाम, जब घर खाली था, चाची ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। "आज मैं तुम्हें कुछ नया सिखाऊंगी," उन्होंने कहा। मैं उत्सुक हो गया।
वो बिस्तर पर लेटीं और मुझे अपने ऊपर खींचा। इस बार उन्होंने मुझे निर्देश दिए – कैसे छुएं, कैसे चूमें। उनकी आवाज में एक आत्मविश्वास था। मैंने वैसा ही किया, और वो खुश हो गईं।
फिर वही पल आया। चाची ने मुझे लिटाया और मेरे लिंग को मुंह में लिया। इस बार वो ज्यादा कुशल थीं, जीभ का इस्तेमाल बेहतर तरीके से। मैंने उनकी प्रशंसा की, "चाची, आप सीख गईं।" वो मुस्कुराईं।
हमारे रिश्ते में अब एक गहराई आ गई थी। हर बार नया अनुभव, नई भावना। लेकिन बाहर की दुनिया से हम सावधान रहते। एक रात, जब सब सो चुके थे, चाची मेरे कमरे में आईं।
"राहुल, आज मुझे तुम्हारी जरूरत है," उन्होंने फुसफुसाया। मैंने उन्हें अंदर खींचा। हमने प्यार किया, इस बार ज्यादा भावुक तरीके से। चाची की आंखों में आंसू थे, खुशी के।
धीरे-धीरे, ये सीख एक आदत बन गई। चाची अब ज्यादा खुल गईं, अपनी इच्छाएं बताने लगीं। मैं भी उन्हें सिखाता, नई चीजें। लेकिन मन में हमेशा एक डर रहता – अगर किसी को पता चला तो?
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फिर भी, वो पल हमें बांधे रखते। एक दोपहर, बारिश हो रही थी। घर में हम अकेले थे। चाची ने मुझे गले लगाया और बोलीं, "राहुल, तुम मेरी जिंदगी हो।" मैंने उन्हें चूमा।
हम बिस्तर पर लेटे। चाची ने फिर से मुंह नीचे किया, इस बार पूरी तरह से कुशल। उनकी हर हरकत मुझे पागल कर रही थी। मैंने उन्हें रोका और खुद उनके साथ वैसा ही किया।
चाची की सिसकियां बढ़ गईं। "राहुल, ये... इतना अच्छा।" हम दोनों एक-दूसरे को संतुष्ट करते रहे, बारिश की आवाज के बीच। वो पल हमारी भावनाओं का चरम था।
समय बीतता गया, लेकिन हमारा बंधन मजबूत होता गया। हर सीख में एक नई कहानी, एक नया प्यार। चाची अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थीं, गुप्त लेकिन सच्चा।
एक रात, हम फिर मिले। चाची ने कहा, "राहुल, आज कुछ अलग करें।" उन्होंने मुझे बांधा और खुद ऊपर आईं। उनकी गतिविधियां तेज थीं, और मैं बस उन्हें देखता रहा।
क्लाइमैक्स के बाद, हम लेटे रहे। चाची की सांसें अभी भी तेज थीं। मैंने उनके बाल सहलाए, और वो मेरी बाहों में सिमट गईं। वो पल शांत था, लेकिन हमारे दिलों में उथल-पुथल।