बेटी की मदद से पूरी हुई इच्छा

सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, और मैं अपनी रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी। रोज की तरह, घर में एक शांत सा माहौल था, जहां बस घड़ी की टिक-टिक और बाहर से आती पक्षियों की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। मैंने कॉफी टेबल पर अखबार रखा और सोचा कि आज का दिन भी वैसा ही गुजरेगा, जैसे बाकी दिन—राहुल कॉलेज जाएगा, प्रिया अपनी ऑनलाइन क्लासेस अटेंड करेगी, और मैं घर संभालते हुए शाम का इंतजार करूंगी।

मैं राधा हूं, चालीस साल की एक सामान्य गृहिणी, जो दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में अपने दो बच्चों के साथ रहती हूं। मेरे पति की मौत को पांच साल हो चुके हैं, एक सड़क हादसे में। तब से मैंने खुद को इन दोनों में ही समर्पित कर दिया है। राहुल मेरा बेटा है, बाइस साल का हो चुका है, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। वो हमेशा शांत और जिम्मेदार रहा है, घर की हर छोटी-बड़ी जरूरत को समझता है। प्रिया मेरी बेटी है, बीस साल की, जो घर से ही अपनी ग्रेजुएशन कर रही है। वो ज्यादा बातूनी है, लेकिन मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी। हम तीनों का ये छोटा सा परिवार अब आदत बन चुका है, जहां हंसी-मजाक और छोटी-छोटी बहसें ही हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं।

उस सुबह मैंने चाय बनाई और ट्रे में रखकर लिविंग रूम में ले आई। राहुल अभी-अभी नहाकर बाहर आया था, उसके बाल गीले थे और वो अपनी किताबें समेट रहा था। "मां, आज लेट हो रहा हूं, जल्दी से चाय दे दो," उसने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने उसकी तरफ देखा, वो हमेशा की तरह स्मार्ट लग रहा था अपनी टी-शर्ट और जींस में। प्रिया भी कमरे से निकली, उसके हाथ में फोन था। "गुड मॉर्निंग मॉम, आज क्या बनाया है ब्रेकफास्ट में?" उसने पूछा, और मैंने हंसकर कहा कि परांठे तैयार हैं। हम तीनों सोफे पर बैठ गए, चाय पीते हुए दिन की प्लानिंग करने लगे।

दिन बीतते हुए मैंने घर के काम निपटाए। दोपहर में प्रिया मेरे पास आई, जब मैं बेडरूम में कपड़े इस्त्री कर रही थी। "मॉम, आप ठीक तो हो न? कल रात आप सो नहीं पाईं थीं," उसने चिंता से पूछा। मैंने उसे देखा, उसकी आंखों में एक गहराई थी जो मुझे हमेशा छू जाती है। "हां बेटा, बस थोड़ी थकान है," मैंने जवाब दिया, लेकिन अंदर से मैं जानती थी कि ये थकान कुछ और ही थी। पति के जाने के बाद से मैंने खुद को अकेला महसूस किया है, लेकिन बच्चों के सामने कभी जाहिर नहीं किया। प्रिया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "मॉम, आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं। बताओ न, क्या बात है?" मैंने हिचकिचाते हुए कहा कि बस पुरानी यादें हैं, लेकिन वो नहीं मानी।

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शाम को राहुल घर लौटा, उसके चेहरे पर थकान थी। हम डिनर टेबल पर बैठे, जहां प्रिया ने अपनी क्लास की कहानियां सुनाईं। राहुल हंस रहा था, और मैं चुपचाप उन्हें देख रही थी। अचानक प्रिया ने कहा, "भाई, मॉम को आजकल नींद नहीं आ रही। शायद तुम्हें उनके साथ ज्यादा समय बिताना चाहिए।" राहुल ने मेरी तरफ देखा, उसकी आंखों में चिंता थी। "मां, क्या हुआ? बताओ तो," उसने पूछा। मैंने मुस्कुराकर टाल दिया, लेकिन अंदर से एक अजीब सी हलचल महसूस हुई। वो हलचल जो मैंने कभी स्वीकार नहीं की थी—राहुल के प्रति एक ऐसी भावना जो मां-बेटे के रिश्ते से परे थी।

रात हुई, और मैं अपने कमरे में लेटी थी। नींद नहीं आ रही थी, विचारों का तूफान था। पति के जाने के बाद से मैंने कभी किसी पुरुष को करीब नहीं आने दिया, लेकिन राहुल... वो बड़ा हो चुका था, उसकी मजबूत कद-काठी, उसकी मुस्कान, सब कुछ मुझे आकर्षित करने लगा था। लेकिन ये सोच ही मुझे डराती थी। क्या मैं गलत हूं? क्या ये सिर्फ अकेलापन है? तभी दरवाजा खुला, प्रिया अंदर आई। "मॉम, सोई नहीं अभी तक?" उसने पूछा और मेरे बगल में लेट गई। मैंने उसे गले लगाया, और हम बातें करने लगे।

प्रिया ने धीरे से कहा, "मॉम, मैं जानती हूं आप क्या महसूस कर रही हैं। पापा के बाद आपने खुद को कितना दबाया है। और राहुल... वो आपका ध्यान रखता है, लेकिन शायद आपको और ज्यादा जरूरत है।" मैं चौंक गई, उसकी बातों से लगा जैसे वो मेरे मन की बात पढ़ रही हो। "क्या मतलब?" मैंने पूछा। प्रिया ने मेरी आंखों में देखा और कहा, "मॉम, मैं देखती हूं कैसे आप उसे देखती हो। ये गलत नहीं है, अगर ये आपकी खुशी है। मैं मदद करूंगी।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। वो उठी और चली गई, लेकिन उसके शब्द मेरे मन में घूमते रहे।

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अगले दिन सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन प्रिया की आंखों में एक अलग चमक थी। दोपहर में जब राहुल घर पर था, प्रिया ने हमें साथ में फिल्म देखने का प्लान बनाया। हम लिविंग रूम में बैठे, मैं बीच में थी। फिल्म रोमांटिक थी, और एक सीन में हीरो-हीरोइन करीब आते हैं। मैंने महसूस किया कि राहुल का हाथ मेरे कंधे के पास है, अनजाने में। प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, "भाई, मॉम को ठंड लग रही है, उन्हें कंबल दे दो।" राहुल ने कंबल लाकर मुझे ओढ़ाया, उसका स्पर्श मुझे गर्माहट दे रहा था। मैंने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखें मेरी आंखों से मिलीं, और एक पल के लिए समय रुक सा गया।

उस रात प्रिया फिर मेरे कमरे में आई। "मॉम, आज आपने देखा न, राहुल भी आपको उतना ही चाहता है। बस उसे थोड़ा पुश चाहिए," उसने कहा। मैंने विरोध किया, "नहीं प्रिया, ये गलत है। वो मेरा बेटा है।" लेकिन प्रिया ने मेरे हाथ पकड़कर कहा, "मॉम, रिश्ते बस नाम हैं। आपकी खुशी महत्वपूर्ण है। मैं कल प्लान करती हूं, तुम बस साथ दो।" उसके शब्दों में एक विश्वास था, जो मुझे हिला रहा था। मैंने हामी भरी, डरते हुए, लेकिन अंदर से उत्सुक भी।

अगली शाम प्रिया ने घर को सजाया, जैसे कोई स्पेशल डिनर हो। राहुल हैरान था, "ये क्या है दी?" उसने पूछा। प्रिया ने हंसकर कहा, "बस मॉम को खुश करने के लिए। आज हम तीनों साथ में समय बिताएंगे।" हमने खाना खाया, वाइन की बॉटल खोली—राहुल ने पहली बार मेरे साथ ड्रिंक की। बातें होने लगीं, पुरानी यादें। प्रिया ने जानबूझकर टॉपिक मोड़ा, "भाई, मॉम कितनी खूबसूरत हैं न? पापा कितने लकी थे।" राहुल ने शरमाते हुए कहा, "हां, मां हमेशा से स्पेशल हैं।" मैंने महसूस किया कि उसकी नजरें अब अलग थीं, मेरे चेहरे पर, मेरे होंठों पर।

रात गहराने लगी, प्रिया ने कहा, "मॉम, तुम्हें मालिश की जरूरत है। भाई, तुम करो न।" राहुल हिचकिचाया, लेकिन प्रिया ने उसे धकेला। हम मेरे कमरे में गए, मैं बेड पर लेटी, राहुल मेरे कंधों को दबाने लगा। उसका स्पर्श मजबूत था, और मैंने आंखें बंद कर लीं। "मां, कैसा लग रहा है?" उसने पूछा। "बहुत अच्छा," मैंने धीरे से कहा। प्रिया बाहर से देख रही थी, मुस्कुरा रही थी। धीरे-धीरे राहुल के हाथ नीचे सरके, मेरी कमर तक। मेरे शरीर में एक करंट दौड़ा, और मैंने सांस ली।

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प्रिया अंदर आई, "भाई, मॉम को और रिलैक्स करो।" उसने मेरी नाइटी की स्ट्रैप्स नीचे की, और राहुल के हाथ अब मेरी नंगी पीठ पर थे। मैंने विरोध नहीं किया, बस महसूस किया। राहुल की सांसें तेज हो रही थीं, और मैंने महसूस किया कि वो भी उत्तेजित हो रहा है। प्रिया ने कहा, "मॉम, अब तुम राहुल को छुओ। वो भी थका है।" मैंने मुड़कर राहुल को देखा, उसकी आंखों में वही इच्छा थी जो मेरे मन में थी। मैंने उसके सीने पर हाथ रखा, उसकी टी-शर्ट उतारी। उसका शरीर मजबूत था, और मैंने उसे छुआ, जैसे कोई सपना सच हो रहा हो।

प्रिया ने दरवाजा बंद किया और कहा, "अब मैं यहां हूं, तुम दोनों को साथ लाने के लिए। मॉम, अपनी इच्छा पूरी करो।" राहुल ने मुझे गले लगाया, उसके होंठ मेरे होंठों से मिले। वो चुंबन गहरा था, सालों की भूख को शांत करने वाला। मैंने उसके शरीर को महसूस किया, उसकी गर्मी को। प्रिया पास बैठी थी, हमें देख रही थी, उसकी आंखों में संतुष्टि थी। राहुल ने मेरी नाइटी उतारी, मेरे स्तनों को छुआ, चूमा। मैं कराह उठी, "राहुल... बेटा..." लेकिन वो रुका नहीं।

हम बेड पर लेटे, राहुल मेरे ऊपर था। उसने धीरे से प्रवेश किया, और मैंने दर्द और सुख का मिश्रण महसूस किया। प्रिया ने मेरा हाथ पकड़ा, "मॉम, ये तुम्हारी इच्छा है, наслаждайся।" राहुल की गतियां तेज हुईं, हर धक्के के साथ मैं अपनी दुनिया में खो गई। उसका पसीना मेरे शरीर पर गिर रहा था, उसकी सांसें मेरी गर्दन पर। मैंने उसे कसकर पकड़ा, जैसे कभी छोड़ना न हो। क्लाइमैक्स आया, और हम दोनों एक साथ झर गए, एक गहरी शांति में।

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लेकिन ये खत्म नहीं हुआ। प्रिया ने कहा, "अब मेरी बारी है मदद करने की।" वो हमारे बीच आई, राहुल को चूमा, और मुझे भी। हम तीनों एक-दूसरे में उलझ गए, भावनाओं का तूफान। राहुल ने प्रिया को छुआ, लेकिन उसकी नजरें मुझ पर थीं। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि हमारा बंधन था। रात भर हमने एक-दूसरे को एक्सप्लोर किया, नए तरीकों से—धीमे स्पर्श, गहरे चुंबन, और वो सुख जो मैंने कभी कल्पना नहीं की थी।

सुबह की रोशनी कमरे में आई, हम तीनों थके लेकिन संतुष्ट लेटे थे। राहुल ने मेरी तरफ देखा, "मां, ये... सही है न?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां, अब सब सही है।" प्रिया ने हंसकर कहा, "देखा, मैंने कहा था न।" हम उठे, लेकिन वो पल हमारे बीच हमेशा रहेगा, एक गुप्त बंधन की तरह।

दिन बीतते गए, लेकिन अब घर में एक नई ऊर्जा थी। शाम को राहुल मेरे पास आता, प्रिया की नजरों तले हम करीब होते। एक रात फिर हम अकेले थे, प्रिया बाहर गई थी। राहुल ने मुझे दीवार से सटाया, उसके हाथ मेरे शरीर पर घूमे। "मां, मैं तुम्हें कितना चाहता हूं," उसने कहा। मैंने उसके कपड़े उतारे, उसकी मर्दानगी को महसूस किया। हम फर्श पर लेटे, उसकी गतियां जंगली थीं, और मैंने हर पल को जीया। क्लाइमैक्स में मैं चीखी, लेकिन सुख की चीख।

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प्रिया लौटी, और हमने फिर साथ में समय बिताया। अब ये हमारी रूटीन बन गई थी—भावनाओं से भरे पल, जहां इच्छाएं पूरी होतीं। एक शाम प्रिया ने कहा, "मॉम, अब तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई न?" मैंने हां कहा, लेकिन अंदर से जानती थी कि ये कभी खत्म नहीं होगा। राहुल ने मुझे चूमा, और हम फिर खो गए उस दुनिया में जहां रिश्ते की कोई सीमा नहीं थी।

रात गहरी हो रही थी, राहुल मेरे बगल में लेटा था, उसका हाथ मेरे स्तन पर। प्रिया दूसरी तरफ थी, उसकी सांसें शांत। मैंने आंखें बंद कीं, महसूस किया कि ये सुख कितना गहरा है। राहुल ने धीरे से मेरे कान में कहा, "मां, और..." मैंने उसे चुप कराया, और हम फिर शुरू हो गए, धीमे-धीमे, जैसे कोई अंतहीन सफर।