अनकही चाहत
सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, जब मैं बिस्तर से उठा। रोज की तरह, मैंने सबसे पहले किचन की तरफ रुख किया, जहां चाय की केतली पहले से ही स्टोव पर रखी हुई थी। बाहर गली में बच्चों की आवाजें आ रही थीं, और घर की खिड़की से पड़ोस की छतें नजर आ रही थीं। मैंने चाय बनाई और सोफे पर बैठकर अखबार खोला, बस एक सामान्य दिन की शुरुआत।
हमारा घर दिल्ली के एक छोटे से इलाके में था, जहां मैं और मेरी छोटी बहन प्रिया अकेले रहते थे। मां-बाप गांव में थे, और मैं यहां नौकरी करता था। प्रिया कॉलेज जाती थी, बीस साल की हो चुकी थी, लेकिन उसकी मुस्कान में अभी भी वो बचपन की मासूमियत बाकी थी। मैं पच्चीस का था, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, और शाम को घर लौटकर हम दोनों साथ खाना बनाते या बाहर से मंगवाते।
उस दिन प्रिया जल्दी उठ गई थी। मैंने देखा वो बालकनी में खड़ी थी, फोन पर किसी दोस्त से बात कर रही थी। "भैया, चाय बना ली?" उसने मुस्कुराकर पूछा, और मैंने हां में सिर हिलाया। हम दोनों सोफे पर बैठे, चाय की चुस्कियां लेते हुए। वो告诉我 अपनी क्लास की बातें, और मैं सुनता रहा, जैसे हर रोज होता था।
हमारा परिवार पहले ज्यादा बड़ा नहीं था। मां-बाप ने हमें अच्छी परवरिश दी, लेकिन पापा की नौकरी चली गई तो वे गांव लौट गए। मैंने जिम्मेदारी संभाली, प्रिया को पढ़ाने का बोझ उठाया। वो मेरी जिंदगी का हिस्सा थी, हमेशा से। बचपन में हम साथ खेलते, अब साथ रहते। कभी-कभी शाम को हम पार्क में घूमने जाते, या घर पर फिल्म देखते।
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एक शाम, जब मैं ऑफिस से लौटा, प्रिया उदास लग रही थी। "क्या हुआ?" मैंने पूछा। वो बोली, "कॉलेज में एक लड़के ने प्रपोज किया, लेकिन मुझे पसंद नहीं आया।" मैंने उसे गले लगाया, जैसे भाई करता है। "तू चिंता मत कर, सही समय पर सही इंसान मिलेगा।" लेकिन उस पल में, उसकी आंखों में कुछ था जो मुझे अजीब लगा, एक गहराई।
दिन बीतते गए। प्रिया अब ज्यादा समय घर पर बिताने लगी, मेरे साथ। वो कहती, "भैया, तुम्हारे बिना ये घर सूना लगता है।" मैं हंसता, लेकिन अंदर से कुछ बदल रहा था। एक रात, बारिश हो रही थी, हम दोनों टीवी देख रहे थे। वो मेरे कंधे पर सिर रखकर बैठी, और मैंने महसूस किया उसकी सांसें मेरे करीब थीं।
मैंने खुद को रोका। वो मेरी बहन थी, लेकिन विचार आते थे। वो अब जवान हो गई थी, उसकी हंसी, उसकी बातें, सब कुछ आकर्षित करने लगा। मैं रातों को सोचता, क्या ये गलत है? लेकिन भावनाएं दबती नहीं थीं। एक दिन, किचन में वो खाना बना रही थी, मैं पीछे से आया और उसकी कमर पर हाथ रखा, मदद के बहाने। वो मुड़ी नहीं, बस मुस्कुराई।
टेंशन बढ़ती गई। हमारी बातें अब लंबी होतीं, आंखें मिलतीं। "भैया, तुम कभी शादी क्यों नहीं करते?" उसने पूछा। मैंने कहा, "तुम्हारे बिना कौन देखभाल करेगा?" वो हंसी, लेकिन उसकी आंखों में चमक थी। मैं अंदर से लड़ रहा था, सही-गलत की जंग। परिवार की यादें, समाज का डर, लेकिन चाहत मजबूत हो रही थी।
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एक वीकेंड, हम घर पर अकेले थे। प्रिया ने कहा, "आज कुछ स्पेशल बनाते हैं।" हम साथ किचन में थे, हंसते-बोलते। अचानक उसका हाथ मेरे हाथ से टकराया, और हम रुक गए। नजरें मिलीं, चुप्पी छा गई। मैंने उसे अपनी ओर खींचा, और वो抵抗 नहीं की।
उस पल में सब कुछ बदल गया। मेरे होंठ उसके होंठों से मिले, एक नरम चुंबन। वो कांप रही थी, लेकिन पीछे नहीं हटी। "भैया..." उसने धीरे से कहा, लेकिन मैंने उसे चुप कर दिया। हम कमरे में गए, जहां रोशनी कम थी। मैंने उसके कपड़े उतारे, धीरे-धीरे, हर स्पर्श में प्यार था।
उसकी त्वचा नरम थी, जैसे रेशम। मैंने उसके शरीर को छुआ, हर हिस्से को महसूस किया। वो मेरे सीने से लगी, उसकी सांसें तेज। "ये गलत है," मैंने सोचा, लेकिन चाहत ने सब दबा दिया। हम एक हुए, पहली बार। दर्द और सुख का मिश्रण, भावनाओं की बाढ़।
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उस रात के बाद, हमारा रिश्ता बदल गया। प्रिया अब मेरी थी, पूरी तरह। सुबह वो मेरे लिए चाय बनाती, शाम को मेरे इंतजार में रहती। "मैं तुम्हारी हूं, भैया," वो कहती। मैं उसे रखैल की तरह रखता, लेकिन प्यार से। हमारा घर अब हमारी दुनिया था, जहां कोई नहीं आता।
दिनों में हम बातें करते, रातों में करीब आते। एक शाम, पार्क में घूमते हुए, उसने कहा, "मुझे डर लगता है, अगर किसी को पता चला तो?" मैंने उसे गले लगाया, "कुछ नहीं होगा, हम साथ हैं।" लेकिन अंदर से मैं जानता था, ये जोखिम भरा था। फिर भी, उसकी मुस्कान सब भुला देती।
हमारी अंतरंग पल बढ़ते गए। कभी बाथरूम में, कभी सोफे पर। हर बार नया अनुभव। एक रात, मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, उसके बालों में उंगलियां फिराईं। वो कराह रही थी, मेरे नाम से। मैंने उसके शरीर को चूमा, हर इंच को। सुख की लहरें, भावनाओं की गहराई।
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प्रिया अब बदल गई थी। वो ज्यादा बोल्ड हो गई, मुझे छेड़ती। "आज क्या करोगे, भैया?" वो पूछती, और मैं हंसता। हमारा रिश्ता अब सिर्फ भाई-बहन का नहीं था, बल्कि प्रेमी-प्रेमिका का। वो मेरी रखैल थी, लेकिन स्वेच्छा से। मैं उसे खुश रखता, उसकी हर इच्छा पूरी करता।
एक दिन, ऑफिस से लौटकर मैंने देखा वो तैयार बैठी थी, नए कपड़ों में। "आज डेट पर चलें?" उसने कहा। हम बाहर गए, रेस्टोरेंट में। हाथों में हाथ डाले, जैसे कोई कपल। घर लौटकर, हम फिर एक हुए। उस बार, ज्यादा पैशन से। मैंने उसे ऊपर लिया, उसके कूल्हों को पकड़ा, गहराई तक। वो चीखी, सुख से।
भावनाएं उफान पर थीं। मैं सोचता, क्या ये हमेशा चलेगा? लेकिन प्रिया कहती, "मैं कहीं नहीं जाऊंगी।" हमारा बंधन मजबूत होता गया। रातें अब लंबी लगतीं, उसकी बाहों में। हर स्पर्श नया, हर चुंबन गहरा।
समय बीतता गया। प्रिया की पढ़ाई खत्म होने वाली थी, लेकिन वो नौकरी नहीं करना चाहती थी। "मैं घर पर रहूंगी, तुम्हारे साथ," वो बोली। मैंने हामी भरी। अब वो पूरी तरह मेरी थी, मेरी रखैल। हम साथ सोते, साथ उठते।
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एक रात, बारिश फिर हो रही थी। हम बिस्तर पर थे, नंगे। मैंने उसके स्तनों को चूसा, धीरे-धीरे। वो मेरे शरीर पर हाथ फेर रही थी, उत्तेजित। हम मिले, लय में। सुख की चरम सीमा, जहां सब कुछ भूल जाते।
उसके बाद, शांति। वो मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी, सांसें सामान्य हो रही थीं। मैंने उसके बाल सहलाए, और हम चुप रहे। वो पल हमारा था, हमारी दुनिया का।